Madan Mohan Danish Gazal : पढ़िये मदन मोहन दानिश की पांच लोकप्रिय और बेहतरीन ग़ज़लें

सुख़न-फ़हम मदन मोहन दानिश अपनी सरल और सहज कविता शैली के लिए जाने जाते हैं। आसान भाषा में मुश्किल बात कहना उनकी लिखावट में चार चाँद लगाता है। दानिश साहब जितना खूब लिखते हैं उतना खूब सुनाते भी हैं। उनकी शायरी में फलसफे भी हैं और रूहानियत भी।

ग़ज़ल 1

आधी आग और आधा पानी हम दोनों
जलती-बुझती एक कहानी हम दोनों

मंदिर मस्जिद गिरिजा-घर और गुरुद्वारा
लफ़्ज़ कई हैं एक मआ’नी हम दोनों

रूप बदल कर नाम बदल कर आते हैं
फ़ानी हो कर भी ला-फ़ानी हम दोनों

ज्ञानी ध्यानी चतुर सियानी दुनिया में
जीते हैं अपनी नादानी हम दोनों

आधा आधा बाँट के जीते रहते हैं
रौनक़ हो या हो वीरानी हम दोनों

नज़र लगे ना अपनी जगमग दुनिया को
करते रहते हैं निगरानी हम दोनों

ख़्वाबों का इक नगर बसा लेते हैं रोज़
और बन जाते हैं सैलानी हम दोनों

तू सावन की शोख़ घटा में प्यासा बन
चल करते हैं कुछ मन-मानी हम दोनों

इक-दूजे को रोज़ सुनाते हैं ‘दानिश’
अपनी अपनी राम-कहानी हम दोनों

ग़ज़ल 2

ये माना उस तरफ़ रस्ता न जाए
मगर फिर भी मुझे रोका न जाए

बदल सकती है रुख़ तस्वीर अपना
कुछ इतने ग़ौर से देखा न जाए

उलझने के लिए सौ उलझनें हैं
बस अपने आप से उलझा न जाए

इरादा वापसी का हो अगर तो
बहुत गहराई में उतरा न जाए

हमारी अर्ज़ बस इतनी है ‘दानिश’
उदासी का सबब पूछा न जाए

ग़ज़ल 3

दे सको तो ज़िंदगानी दो मुझे
लफ़्ज़ तो मैं हूँ मआ’नी दो मुझे

खो न जाए मुझ में इक बच्चा है जो
यूँ करो कोई कहानी दो मुझे

हम-ज़बाँ मेरा यहाँ कोई नहीं
लाओ अपनी बे-ज़बानी दो मुझे

है हवा दरकार मेरी आग को
कब कहा उस ने कि पानी दो मुझे

एक मंज़िल ने तो ‘दानिश’ ये कहा
रास्तों की कुछ निशानी दो मुझे

ग़ज़ल 4

है इंतिज़ार मुक़द्दर तो इंतिज़ार करो
पर अपने दिल की फ़ज़ा को भी ख़ुश-गवार करो

तुम्हारे पीछे लगी हैं उदासियाँ कब से
किसी पड़ाव पर रुक कर इन्हें शिकार करो

हमारे ख़्वाबों का दर खटखटाती रहती हैं
तुम अपनी यादों को समझाओ होशियार करो

भली लगेगी यही ज़िंदगी अगर उस में
ख़याल-ओ-ख़्वाब की दुनिया को भी शुमार करो

भरोसा बा’द में कर लेना सारी दुनिया पर
तुम अपने आप पर तो पहले ए’तिबार करो

ग़ज़ल 5

सितारे जिनकी बहुत देख-भाल करते रहे
हम ऐसी सारी शबों को निहाल करते रहे

हमारे राह-नुमा भी कमाल करते रहे
जवाब देना था उन को सवाल करते रहे

मगर नदी ने सुनी ही नहीं किनारों की
ये और बात कि वो अर्ज़-ए-हाल करते रहे

तमाम रात मिरी नींद मुझ को डसती रही
तमाम ख़्वाब मिरी देख-भाल करते रहे

तमाम उम्र तुम्हीं मुतमइन रहे ‘दानिश’
तमाम उम्र तुम्हीं थे मलाल करते रहे

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