Gulzar Poems -गुलज़ार की 10 कविताएं जिन्हें आपको पढ़ना चाहिए!

गुलज़ार एक अप्रतिम फ़िल्मकार हैं जो कविताएँ, कहानियाँ लिखते हैं। पढ़िए उनकी चुनिंदा कविताएँ जो आपको अंदर से झकझोर देंगी।

इश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता!

इश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता
‘फ़ाउल’ होते हैं बेशुमार मगर
‘पेनल्टी कॉर्नर’ नहीं मिलता!
दोनों टीमें जुनूँ में दौड़ती, दौड़ाये रहती हैं
छीना-झपटी भी, धौल-धप्पा भी
बात बात पे ‘फ़्री किक’ भी मार लेते हैं
और दोनों ही ‘गोल’ करते हैं!
इश्क़ में जो भी हो वो जाईज़ है
इश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता!

वक़्त

वक़्त काटना क्या मुश्किल है?
एक घंटे को आधा-आधा कर के दो हिस्सों में काट लो पहले
उसको फिर से आधा कर लो तो…
पन्द्रह मिनट हैं!
पन्द्रह मिनट को तीन हिस्सों में काटो
पाँच मिनट के तीन हिस्से बचते हैं…
पाँच को काटो तीन और दो
दो के फिर दो…
एक बचेगा!…
दो घंटे से लेट है फ़्लाइट
एयरपोर्ट पर बैठा वक़्त को काट रहा हूँ!

सॉरी सर!

बड़े बेज़ायक़ा से लफ़्ज़ भर जाते हैं कुछ मुँह में
कि जैसे मिट्टी भर जाए
या जैसे रेत फाँकी हो
निगल सकता हूँ, न मैं थूक सकता हूँ
मैं ख़ुद को लानतें देता हूँ,
मेरे होंट काग़ज़ के फटे टुकड़े की मानिन्द फडफ़ड़ाते हैं, मुझे जब बेवजह अफ़सर से माफ़ी माँगनी पड़ती है दफ़्तर में!

वो इस्तीफा देकर आया था

वो इस्तीफ़ा देकर आया था
मेज़ पे ज़ोर से हाथ मार के बोला
जैसे इक्का फेंका हो
“और नहीं इन्सान की नौकरी होती मुझसे
सब के सब ‘एक्सप्लॉइट’ करते हैं!”
पुरोहित है अब, वो…
भगवान ‘एक्सप्लॉइट’ करता है!

देखो, आहिस्ता चलो!

देखो, आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता ज़रा,
देखना, सोच-सँभल कर ज़रा पाँव रखना,
ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं
काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में,
ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जाये देखो,
जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा!

गुस्सा

बूँद बराबर बौना-सा भन्नाकर लपका
पैर के अँगूठे से उछला
टख़नों से घुटनों पर आया
पेट पे कूदा
नाक पकड़ कर
फन फैला कर सर पे चढ़ गया
ग़ुस्सा!

ग़ालिब

बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ
सामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के क़सीदे
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वा
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे
एक बकरी के मिम्याने की आवाज़
और धुँदलाई हुई शाम के बे-नूर अँधेरे साए
ऐसे दीवारों से मुँह जोड़ के चलते हैं यहाँ
चूड़ी-वालान कै कटरे की बड़ी-बी जैसे
अपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बे-नूर अँधेरी सी गली-क़ासिम से
एक तरतीब चराग़ों की शुरूअ’ होती है
एक क़ुरआन-ए-सुख़न का सफ़हा खुलता है
असदुल्लाह-ख़ाँ-‘ग़ालिब’ का पता मिलता है

अख़बार

सारा दिन मैं ख़ून में लत-पत रहता हूँ
सारे दिन में सूख सूख के काला पड़ जाता है ख़ून
पपड़ी सी जम जाती है
खुरच खुरच के नाख़ूनों से
चमड़ी छिलने लगती है
नाक में ख़ून की कच्ची बू
और कपड़ों पर कुछ काले काले चकते से रह जाते हैं
रोज़ सुब्ह अख़बार मिरे घर
ख़ून में लत-पत आता है

रात

मिरी दहलीज़ पर बैठी हुई ज़ानू पे सर रक्खे
ये शब अफ़्सोस करने आई है कि मेरे घर पे
आज ही जो मर गया है दिन
वो दिन हम-ज़ाद था उस का
वो आई है कि मेरे घर में इस को दफ़्न कर के
इक दिया दहलीज़ पर रख कर
निशानी छोड़ दे कि महव है ये क़ब्र
इस में दूसरा आ कर नहीं लेटे
मैं शब को कैसे बतलाऊँ
बहुत से दिन मिरे आँगन में यूँ आधे अधूरे से
कफ़न ओढ़े पड़े हैं कितने सालों से
जिन्हें मैं आज तक दफ़ना नहीं पाया

आदमी बुलबुला है

आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतहा पर
टूटता भी है डूबता भी है
फिर उभरता है, फिर से बहता है
न समुंदर निगल सका इस को
न तवारीख़ तोड़ पाई है
वक़्त की हथेली पर बहता
आदमी बुलबुला है पानी का

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