Indian Politics : बिहार कैसे बन सकता है आत्मनिर्भर?

एक मशहूर कहावत है, ‘एक बिहारी सौ पे भारी’। यानी कि एक बिहारी सौ के बराबर होता है। यह बात एक हद तक सच भी है। बिहारियों का देश के विकास में वृहत योगदान रहा है। देश के प्रथम राष्ट्रपति (President) की जन्मभूमि, भगवान बुद्ध (Budh) की तपोभूमि, दुनिया का सबसे बड़ा वाई-फाई जोन वाला राज्य बिहार (Bihar) है। बिहार के रज रज में प्रतिभा शामिल है। मगर फिर भी बिहार कहीं ना कहीं उस स्तर तक नहीं पहुँच सका है जहाँ उसे होना चाहिए था। बिहार का यूँ तो इतिहास सुनहरा रहा है। मगर अब इतिहास बीत चुका है। वक़्त का तक़ाज़ा है कि बात वर्तमान की हो। वर्तमान में जांचा जाये कि बिहारी का मतलब गाली है या गर्व?

प्रारंभिक उच्च शिक्षा, अध्यात्म व उत्कृष्ट बुद्धिजीवियों का केंद्र रहा बिहार आज की तारीख में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार है। आखिर ऐसा क्यों है? क्यों विकास की रफ़्तार यहाँ धीमी पड़ गयी? बिहार की इस डामाडोल स्थिति का गुनहगार कौन?

आइये पहले बिहार की समस्याओं को एक एक कर समझने की कोशिश करते हैं।

बेरोजगारी की समस्या

बेरोजगारी हमेशा से ही बिहार में युवाओं के लिए परेशानी का सबब रहा है। उद्योगों की भारी कमी की वजह से युवाओं को बिहार में उचित रोजगार नहीं मिल पाता है। साधनों की कमी के चलते प्रतिभाशाली बच्चे लक्ष्यभ्रष्ट के साथ पथभ्रष्ट भी हो जाते हैं। इसके अलावा कई युवा सरकारी नौकरी की फिराक में जीवन गुजार देते हैं और अंत में उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। अंततः वो कभी सिस्टम तो कभी किस्मत को कोस कर जीवनयापन को दूसरा तरीका ढूंढ लेते हैं। साफ सरल शब्दों में कहें तो बिहारी युवा अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं।

युवाओं का पलायन

रोजगार की तलाश में बिहारी युवाओं को घर से दूर जाना पड़ता है। वह अमूमन दिल्ली, कोलकता, मुबंई, चंडीगढ़ आदि के लिए रवाना हो जाते हैं। पलायन कर के सफलता हाथ लगेगी यह भी तय नहीं है। मगर वह मौका नहीं छोड़ते क्योंकि युवा जानते हैं कि उनकी आर्थिक तंगी का हल सिर्फ और सिर्फ रोजगार है।

फिसड्डी स्वास्थ्य व्यवस्था

बचपन से हमें सिखाया जाता है ‘Health is Wealth’ यानी ‘स्वास्थ्य ही संपत्ति है’। अगर स्वास्थ्य नहीं तो कुछ भी नहीं। बिहार में स्वास्थ्य की व्यवस्था लचर है। हाल ही में नीति आयोग ने बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर अपनी रिपोर्ट भी जारी की थी। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में प्रत्येक एक लाख की आबादी पर सिर्फ 6 बेड मौजूद हैं। यह दर्शाता है कि जनता को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने में सरकार बुरी तरह नाकाम रही है। कोरोना काल में भी बिहार की खस्ताहाल स्वास्थ्य व्यवस्था ने दम तोड़ दिया था।

जातपात की राजनीति

‘You don’t cast your Vote, you Vote your Caste’

जात पात की राजनीति ने बिहार को अंदरूनी चोट दी है। जब ‘जात-धर्म-पंथ’ चुनाव के मुद्दे बन जाते हैं तो नतीजतन विकास, स्वास्थ्य, साफ पानी, शिक्षा जैसी चीजें अप्रधान हो जाती हैं। तभी ऐसा कहा जाता है कि बिहार में बगैर जात की राजनीति की बात करना भी बेमानी है। सत्तारूढ़ जेडीयू के साथ तमाम पार्टियां जात आधारित राजनीति के दम पर ही बिहार में फल फूल रही हैं। आसान भाषा में कहें तो ‘जातिवाद’ बिहार में सियासतदारों की राजनैतिक पूंजी है।

प्रतिभा की कमी नहीं है बिहार में

बिहारियों में कौशल की कमी नहीं है। साथ ही साथ उनमें ललक है कुछ कर गुजरने का। मगर जैसा की शायर पीयूष मिश्रा जी ने कहा है –

जो कर गुज़र तो बात है ना कर गुज़र तो गम नहीं
जो हर घड़ी को कर गया ऐसा कोई रूस्तम नहीं

यानी हमेशा आप सफल होंगे यह संसार में मुमकिन नहीं है। मगर कोशिश जारी रखनी चाहिए। बिहारी भी यही कर रहे हैं। कड़ी मेहनत ही उनकी पूंजी है। लीक से हट कर कुछ करने का सपना देख रहे छात्रों को हमेशा यह सवाल स्वयं से पूछना चाहिए कि वे अपने जीवन में क्या और क्यों बनना चाहते हैं? जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए जुनूनी होना अनिवार्य है।

कैसे तरक्की कर सकता है बिहार?

“उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः”

अगर बिहार तरक्की के शिखर पर पहुँचना चाहता है तो सबसे जरूर है युवाओं का राजनीति में आना और अपनी बातों को प्रभावी ढंग से दुनिया के सामने रखना। बिहार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के युवाओं को अपने कंधे पर जिम्मेदारी लेनी होगी। अगर युवा पिछलग्गू रह गये तो बिहार को बेड़ा गर्क होना निश्चित है।

हाँ, पिछले 10 सालों में लोगों के घरों में बिजली पहुंची, लेकिन वो बल्ब-पंखे के अलावा कुछ नहीं इस्तेमाल कर सके। बिहर में सड़क बन गई लेकिन चलाने के लिए लोगों के पास गाड़ी नहीं है। इसलिए बिहारियों को जागरूक होने की जरूरत है। जागरूकता से ही बिहार की कायापलट हो सकती है और बिहार ‘आत्मनिर्भरता’ बन सकता है।

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