Mamta Banerjee: प्रदेश के नेता ने जब देश की सत्ता संभाली

अगर आप राजनीति को पसंद करते है जिज्ञासा और दिलचस्पी रखते है कि आखिर भारत की राजनीति मौजूदा समय में किस पड़ाव पर है और क्या कह रही है क्या चल रहा है तो फिर आपको अभी तक एक खबर ने चौकां भी दिया होगा और कुछ लोगों को तो समझ भी आ गया होगा ये कोई नई बात नहीं है इससे पहले भी राजनीति में यह घटना हो चुकी है।

फिलहाल ताजा मामला यही है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पिछले कुछ दिनों से देश के विभिन्न राज्यों का दौरा कर रही है उनका मकसद यह भी है कि सत्ता पक्ष इतना मजबूती के साथ आगे बढ रहा है और विपक्ष है कि बिखरा और कमजोर नजर आ रहा है इसको देखते हुए उनकी मंशा दो है पहली वह तीसरा मोर्चा बनाना चाहती है दूसरा यह कि विपक्ष का मुख्य चेहरा बनना चाहती है ऐसे में एक विपक्ष के तौर पर तो उनकी दोनों बातों पर सोच तो ठीक है मगर विपक्ष की को सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है क्या वह ऐसा करने देगी ममता बनर्जी को । ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब और तीसरे मोर्चे पर किसकी क्या सोच है उस पर नजर डालते है

ममता बनर्जी ही मुख्य चेहरा क्यों | Why Mamata Banerjee is The Main Face

मीडिया , अखबारों में यहां तक कि राजनीति जानकारों के बीच चर्चा ने जोर पकड़ ली है कई विपक्षी दल में भी इस बात को लेकर राजनीति गर्म हो गई है कि आखिर तीसरे मोर्चे का चेहरा ममता बनर्जी ही क्यों । कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव जो 2024 में होंगे उसमे 300 सीटें जीतना दूर का सपना है । आजाद का इशारा अपनी ही पार्टी कांग्रेस की तरफ था । उधर एक बात यह भी है कि ममता बनर्जी की तृणमूल क्या कांग्रेस की जगह ले पाएगी ।

ममता बनर्जी एंड गौतम अदाणी

ममता बनर्जी ने यह खेल इसलिए भी खेला है कि पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के बड़े बड़े नेता तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए है, और अधीर रंजन ने खुलकर ममता बनर्जी का विरोध किया और कहा कि बीजेपी से मिल जुलकर कांग्रेस के नेताओ को शामिल कर रही है.

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि तृणमूल कांग्रेस और खास तौर पर ममता बनर्जी देश के अन्य राज्यों में पैठ जमा रही है यह उनकी जल्दबाजी है, और कांग्रेस पार्टी के पास प्रधानमंत्री के तौर पर चेहरे बहुत है कांग्रेस मौका पड़ने पर ममता बनर्जी को किनारे कर सकती है यह बात सही है कि बंगाल में हुए चुनाव में वह शेर की तरह लडी ।

इससे पहले भी हुए है प्रयोग

ममता बनर्जी जो इस समय करने की कोशिश कर रही है वह राजनीति के तौर पर कोई नई बात नही है । राजनीतिक इतिहासकारों की माने तो ऐसे प्रयोग पहले भी हो चुके है याद कीजिए जब एंटी रामाराव ने अविभाजित आंध्रप्रदेश में भारी भरकम जीत दर्ज की थी उस जीत के साथ ही उनकी छवि और मांग इतनी तेज हुई वो भी राष्ट्रीय स्तर पर । इसके बाद उन्होंने पार्टी का नाम भरत देशम पार्टी रख दिया ।कुछ ऐसा ही समय था कि एंटी आर दिल्ली का सपना देख रहे थे और पीछे से उनके दामाद चन्द्र बाबू नायडू ने तख्तापलट कर भारी जीत के साथ सत्ता हथिया ली ।

एक दौर मुलायम सिंह यादव और लालू यादव पर भी आया । वो केंद्रीय मंत्रिमंडल तक भी पहुंचे । मगर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक कामयाब नही हो सके । नीतीश कुमार भी ऐसे ही गुजरे मगर सफल नहीं हुए । इस तीसरे मोर्चे ने अब तक सिर्फ दो प्रधानमंत्री दिए है विश्व प्रताप सिंह और चंद्र शेखर मगर इस मोर्चे के नेता एंटी रामाराव ही थे । एक बात समझने योग्य है बिना कांग्रेस पार्टी के तीसरा मोर्चा बनना असम्भव सा है ।

ममता का ख्वाब अधूरा न रह जाए

जैसा कि हम ऊपर बात कर ही चुके है कि ममता बनर्जी विपक्ष का मुख्य चेहरा और लीडर बनना चाहती है इसलिए ममता बनर्जी का मकसद सिर्फ लीडर बनना ही नहीं है वो भी तीसरा मोर्चा बनाकर बल्कि प्रधानमंत्री बनना भी उनकी इस राजनीति का हिस्सा है । ऐसा नहीं है कि ममता बनर्जी में पीएम बनने की काबिलियत और प्रतिभा नहीं है कई बड़े राजनीति विशेषज्ञ कह चुके है अगर कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पीएम चेहरे की चुनौती दे सकता है तो वह सिर्फ ममता बनर्जी है ।

लेकिन समस्या इस बात की भी है कि देश की सबसे बड़ी और पहली पार्टी कांग्रेस ऐसा करने देगी उनको । क्योंकि कांग्रेस की परिवारवाद की राजनीति रही है और उसे वह किसी भी कीमत पर आगे बढ़ाना चाहती है अगर ममता धोखे से भी पीएम बन गई तो कांग्रेस के लिए वह परेशानी बन जाएगी ।

मतलब ऐसी हड्डी बनेगी कांग्रेस के लिए कि वह ना तो निगलते बनेगी और ना ही उगलते । ऐसे में पीएम बनना ममता का ख्वाब ही रहेगा ।

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