UP Election 2022: यूपी चुनाव में गरीबी पर किसका ध्यान है

उत्तर प्रदेश भारत देश का सबसे बड़ा आबादी वाला राज्य है मगर कुछ समय से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक पार्टियों के बीच हलचल , नेताओं का दल बदलू रवैया , एक दूसरे को कोसना उनकी कमियां गिनाना और अपनी कार्य की डुग्गी बजाना , यहां तक कि गली नुक्कड़ में जनता अपने अपने पार्टी और नेताओं के काम का बखान कर रहे है ज्यादा आगे न समझाते हुए अब तक तो आप समझ गए ही होंगे कि आखिर देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की चर्चा क्यों कर रहे है हम ।

क्योंकि मौजूदा समय में यूपी के नेता और जनता दोनों ही चुनावी रंग मे रंग चुके है क्योंकि आगामी उत्तर प्रदेश 2022 विधानसभा चुनाव जो सर पर खड़ा है खैर ये तो हमने मोटा माटी बात कर ली लेकिन असल बात करेंगे उसकी जो ऊपर हमने शीर्षक पर लिखा है । उत्तर प्रदेश चुनाव में सभी पार्टी के नेता अपनी अपनी हर वो उपलब्धि बता और गिना रहे है लेकिन असल मुद्दे की चर्चा क्यों नहीं कर रहे है वो है गरीबी की चर्चा क्या आपने गौर किया शायद किया भी होगा और नहीं भी । तो हम आपको बताएंगे असल में गरीबी का चुनावी डिब्बा क्यों बन्द है अभी तक तो समझिए शुरुआत से अब तक ।

कांग्रेस हितैषी थी फिर क्यों साफ हुई (Congress Party in UP election 2022)

वैसे तो उत्तर प्रदेश में दो बड़ी और दो क्षेत्रीय पार्टी ने सत्ता संभाली है मतलब कांग्रेस , बीजेपी , बसपा और सपा फिर भी आज उत्तर प्रदेश में गरीबी का अंत जड़ से क्यों नहीं हो पाया । चलिए थोड़ा पीछे चलते है साल 1971 कांग्रेस सत्ता में थी आयरन लेडी इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी उन्होंने एक नारा दिया वो कहते है इंदिरा हटाओ हम कहते है गरीबी हटाओ तब इंदिरा गांधी की जीत मे इस नारे के योगदान को सभी राजनीति विश्लेषकों ने स्वीकार किया एक आंकड़े की माने तो उस दौर में गरीबी दर 57 फीसदी थी मगर आज 2021 चल रहा है और यूपी चुनाव को सिर्फ 3 महीने बचे है मगर हकीकत में हालात देखें तो यह है कि गरीबी अभी मौजूद है जबकि सबसे ज्यादा यूपी में कांग्रेस पार्टी ने सत्ता का सुख भोगा है एक खास बात यह भी तो रही है कि यूपी मे अलग अलग पार्टियों ने अपने हिसाब से गरीबी मापी पता नहीं उनके पास कौन सा मित्र था ये तो वही जाने । एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार गरीबी के मामले में उत्तर प्रदेश तीसरा गरीब राज्य है ।

जीवन स्तर और गरीबी का आधार

बहुत लोग समझते है कि गरीबी का मतलब पैसा नहीं है मतलब जिसके हाथ मे पैसा नहीं है सिर्फ वही गरीब है अगर नीति आयोग की गरीबी सूचकांक की बात करे तो प्रति व्यक्ति आय और फिर गरीबी रेखा से कितने लोग उपर है कितने लोग नीचे इस आधार पर नहीं है जीने के आधार सही होना चाहिए सच तो यही है कि कुछ चीजे पैसे से खरीदी जा सकती है कुछ चीजें नहीं भी ।

नेताओं के लिए गरीबी मुद्दा क्यों नहीं बनता

शुरू में जब चुनाव होते थे तो देखा जाता था कि जनता के बीच चुनावी मुद्दा गरीबी ही हुआ करता था लेकिन हर बार गरीबी मिटाने पर नेता जी उंट के मुंह में जीरा वाली गरीबी हटा देते थे मगर उसकी जड़ों तक कभी पहुचनें की कोशिश भी किसी पार्टी ने नहीं की । अब हाल यह है कि गरीबी से चल कर जाति और धर्म को चुनावी मुद्दा बनाकर पार्टियां चलती है और दूसरी तरफ गरीबी मिटाने की जगह चीजे मुफ्त में बाटने की हुंकार दिखने लगी । अब तो नेता जी समझ गए है कि मुफ्त में बाटने वाली राजनीति ही बेडापर करेगी ।

मुफ्त चीजे देने की शुरुआत दक्षिण भारत से हुई थी और अब उत्तर भारत मे चलन जोरों पर है आजादी के सत्तर साल बाद भी ऐसा लगता है कि जब देश आजादी के 100 साल का जश्न मना रहा होगा तब भी गरीबी किसी कोने में सिसक का रो रही होगी ।

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