Death anniversary: साहिर लुधियानवी एक ऐसे शायर जिन्होंने दुनिया को इश्क सिखाया पर खुद सारी जिंदगी तन्हा रहे

अब्दुल हयी जिसे पूरी दुनिया ‘साहिर लुधियानवी’ (Sahir Ludhianvi) के नाम से जानती है का जन्म 8 मार्च 1921 को लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था। बचपन से ही साहिर को पढ़ने लिखने में बड़ा मन लगता था। कॉलेज में पहुँचकर उन्होंने शेर कहना शुरू कर दिया था। उनकी उमदा शायरी के बदौलत ही वो अपने कॉलेज का एक चर्चित चेहरा बन गये थे। और कॉलेज की ही बात है जब उन्हें एक लड़की से प्यार हो गया, जिसका नाम था अमृता प्रीतम। दोनों के प्यार के किस्से इतने मशहूर हुए कि यह बात अमृता के घरवालों को पता चल गयी। अमृता के घरवाले साहिर और अमृता के रिश्ते से नाखुश थे क्योंकि साहिर मुस्लिम थे और उन दोनों उनकी माली हालत भी दुरूस्त नहीं थी। नतीजतन ना चाहते हुए भी साहिर का प्रेम मुकाम तक नहीं पहुंच सका। और तो और अमृता के पिता के कहने पर उन्हें कालेज से भी निकाल दिया गया। जीविका चलाने के लिये उन्होंने तरह तरह की छोटी-मोटी नौकरियाँ की मगर असफल रहे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनकी किस्मत में कुछ बेहतर लिखा था।

1945 में पहली कविता संग्रह ‘तल्खियां’ छपी

1945 में साहिर लुधियानवी की कविता संग्रह आई जिसका नाम था ‘तल्खियाँ’। तल्खियाँ यानी कड़वाहट। साहिर यूँ तो मोहब्बत के शायर से पर उन्होंने मोहब्बत कम और कड़वाहट ज्यादा देखी थी। इस संग्रह को उनके चाहने वालों ने हाथों हाथ लिया। यहाँ से उन्होंने एक नई शुरुआत की और कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

“कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया”

मैं पल दो पल का शायर हूँ…

फिल्मों में भी उनके लिखे हुए गीत हिट साबित हुए। शायराना और आशिकाना मिज़ाज के साहिर ने जो लिखा वह जीवन का फलसफा बन गया। उनकी शायरी यथार्थ से मेल खाती थी। इसलिए कम समय में वो बुलंदी पर पहुँच गये। यह उनकी कलम की करिश्माई का ही नतीजा था कि हर फिल्मकार और संगीतकार उसके साथ काम करना चाहता है। जब उनसे पूछा गया कि वह अपनी सफलता को किस तरह देखते हैं तो उन्होंने कहा, ‘मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी है, पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी है।’

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